निकाह और मियाँ-बीवी का रिश्ता
निकाह का मक़सद, पति और पत्नी के हक़ और ज़िम्मेदारियाँ, और मुश्किल वक़्त में क़ुरआन और सुन्नत की रहनुमाई।
- निकाह का मक़सद: सुकून, मुहब्बत और रहमत
- मियाँ बीवी के हक़: दोनों तरफ़ की ज़िम्मेदारी
- अच्छे पति की ख़ूबियाँ
- पति की ज़िम्मेदारियाँ
- नेक पत्नी की ख़ूबियाँ
- पत्नी की ज़िम्मेदारियाँ
- जिन बातों से रिश्ते को बचाना है
- घर का ज़िम्मेदार, बात मानना और उसकी हद
- जब रिश्ता मुश्किल हो जाए
निकाह का मक़सद: सुकून, मुहब्बत और रहमत
निकाह के दिन दो लोग एक दूसरे का हाथ थामते हैं और एक नई ज़िंदगी शुरू होती है। क़ुरआन इस रिश्ते को एक बहुत ख़ूबसूरत नाम देता है। वह इसे अल्लाह की निशानी कहता है: "और उसकी निशानियों में से यह है कि उसने तुम्हारे लिए तुम ही में से जीवन साथी बनाए, ताकि तुम उनके पास सुकून पाओ, और उसने तुम्हारे बीच मुहब्बत और रहमत रख दी। बेशक इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो सोचते समझते हैं।"1
इस एक आयत में निकाह का पूरा मक़सद आ गया है। पहली बात है सुकून, यानी घर ऐसी जगह हो जहाँ दिन भर की थकान उतर जाए। दूसरी बात है मुहब्बत, जो दिल में भी हो और बातचीत और बर्ताव में भी दिखे। और तीसरी बात है रहमत, यानी वह नरमी और हमदर्दी जो बीमारी, बुढ़ापे और मुश्किल वक़्त में भी साथ निभाए। आयत यह भी बताती है कि यह मुहब्बत और रहमत अल्लाह ने ख़ुद रखी है। इसलिए इसके बढ़ने की दुआ भी उसी से की जा सकती है।
यह रिश्ता इतना गहरा क्यों है, इसका इशारा एक और आयत में मिलता है: "ऐ लोगो, अपने रब से डरो जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया और उसी से उसका जोड़ा बनाया।"2 पति और पत्नी की असल एक ही है, और रब भी एक ही है। इसी लिए वे एक दूसरे के साथी हैं, और एक दूसरे के दुख सुख को अपना समझते हैं।
एक दूसरे का लिबास
इस नज़दीकी को समझाने के लिए क़ुरआन ने एक बहुत प्यारी मिसाल दी है: "वे तुम्हारे लिए लिबास हैं और तुम उनके लिए लिबास हो।"3 यहाँ एक ही लफ़्ज़ दोनों के लिए आया है। लिबास इंसान के सबसे क़रीब होता है। वह उसकी कमियों को ढकता है, उसे गर्मी और सर्दी से बचाता है और उसकी ख़ूबसूरती बढ़ाता है। पति और पत्नी भी एक दूसरे के लिए यही होते हैं। वे एक दूसरे की कमियों पर पर्दा रखते हैं, एक दूसरे को संभालते हैं और एक दूसरे की ख़ूबसूरती बन जाते हैं।
और यह नज़दीकी सिर्फ़ जज़्बात पर नहीं टिकी होती। जज़्बात कभी तेज़ होते हैं और कभी हल्के, लेकिन निकाह एक वादा है जो अपनी जगह रहता है। क़ुरआन पत्नी के बारे में मर्द से कहता है: "और उन्होंने तुमसे बहुत पक्का वादा लिया है।"4 यही लफ़्ज़ क़ुरआन ने उस वादे के लिए भी इस्तेमाल किए हैं जो अल्लाह ने अपने नबियों से लिया था।5 इससे अंदाज़ा होता है कि अल्लाह के नज़दीक इस रिश्ते की कितनी क़द्र है।
निकाह भी दीन का हिस्सा है
इसी लिए घर बसाना दीन से दूर होना नहीं है। तीन लोगों ने नबी ﷺ की इबादत का हाल सुना तो उन्हें अपनी इबादत कम लगी। एक ने हर रात नमाज़ पढ़ने का इरादा किया, दूसरे ने हमेशा रोज़ा रखने का, और तीसरे ने कहा कि वह निकाह नहीं करेगा। नबी ﷺ ने उन्हें बताया: "लेकिन मैं रोज़ा रखता भी हूँ और छोड़ता भी हूँ, नमाज़ पढ़ता भी हूँ और सोता भी हूँ, और औरतों से निकाह भी करता हूँ।"6 यानी अपने घर वालों के साथ अच्छी ज़िंदगी बिताना भी नबी ﷺ के तरीक़े पर चलना है।
तो जब आप अपने जीवन साथी के लिए कुछ अच्छा करने का सोचें, तो याद रखिए कि यह भी अल्लाह को ख़ुश करने का एक रास्ता है। और उसी से यह दुआ माँगते रहिए जो क़ुरआन ने सिखाई है: "ऐ हमारे रब, हमें हमारे जीवन साथियों और हमारी औलाद से आँखों की ठंडक दे, और हमें अल्लाह से डरने वालों के लिए आगे चलने वाला बना।"7 आमीन।
संदर्भ: 1 क़ुरआन 30:21, 2 क़ुरआन 4:1, 3 क़ुरआन 2:187, 4 क़ुरआन 4:21, 5 क़ुरआन 33:7, 6 सहीह अल-बुख़ारी 5063, 7 क़ुरआन 25:74.
मियाँ बीवी के हक़: दोनों तरफ़ की ज़िम्मेदारी
हर जोड़े के दिल में यह ख़्वाहिश होती है कि उनका रिश्ता दिन ब दिन और ख़ूबसूरत होता जाए। अच्छी बात यह है कि अल्लाह तआला ने ख़ुद इस रिश्ते का ज़िक्र क़ुरआन में किया है, और बताया है कि पति और पत्नी दोनों का एक दूसरे पर हक़ है: "और औरतों के भी भले तरीक़े से वैसे ही हक़ हैं जैसे उन पर ज़िम्मेदारियाँ हैं।"1
हक़ का लफ़्ज़ सुनकर कभी लगता है कि यह कोई सख़्त सी बात होगी। लेकिन घर में इसका मतलब बस इतना है कि हम एक दूसरे की ज़रूरत और ख़ुशी को अपनी ज़िम्मेदारी समझ लें। पति पत्नी का ख़याल रखे, पत्नी पति का, और दोनों यह काम अल्लाह को ख़ुश करने के लिए करें।
एक अमानत
इस रिश्ते की क़द्र का अंदाज़ा इससे होता है कि नबी ﷺ ने अपने आख़िरी हज के ख़ुत्बे में भी इसका ज़िक्र किया। आप ने फ़रमाया: "औरतों के बारे में अल्लाह से डरो, क्योंकि तुमने उन्हें अल्लाह की अमान में लिया है।"2 यानी निकाह के बाद पत्नी पति के पास अल्लाह की अमानत होती है। जब यह बात पति के दिल में बैठ जाती है, तो उसकी बातों और उसके बर्ताव में ख़ुद ही नरमी आ जाती है।
इसी ख़ुत्बे की एक रिवायत में आप ﷺ ने दोनों का ज़िक्र एक साथ किया: "सुनो! तुम्हारे अपनी पत्नियों पर हक़ हैं, और तुम्हारी पत्नियों के तुम पर हक़ हैं।"3 फिर आप ने दोनों के हक़ की मिसाल भी दी। पत्नी घर में किसी ऐसे शख़्स को न आने दे जो पति को पसंद न हो, और पति पत्नी के खाने और कपड़े का अच्छे से ख़याल रखे।3 यह घर की रोज़ की बातें हैं, और इन्हीं से एक दूसरे पर भरोसा बनता है।
खाने की बात आई है तो एक प्यारी हदीस भी सुन लीजिए। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "तुम अल्लाह की रज़ा के लिए जो कुछ ख़र्च करो, उस पर तुम्हें सवाब मिलेगा, यहाँ तक कि उस निवाले पर भी जो तुम अपनी पत्नी के मुँह में डालते हो।"4 एक निवाला कितनी छोटी सी चीज़ है, फिर भी अल्लाह के यहाँ उसका सवाब है। तो जो पति अपनी पत्नी की ज़रूरत पूरी करता है, वह सिर्फ़ एक ज़िम्मेदारी अदा नहीं कर रहा, बल्कि सवाब भी कमा रहा है।
इसी तरह पत्नी भी घर में एक बड़ी ज़िम्मेदारी संभालती है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "मर्द अपने घर वालों का निगहबान है और उससे उनके बारे में सवाल होगा, और औरत अपने पति के घर और उसके बच्चों की निगहबान है और उससे उनके बारे में सवाल होगा।"5 इस हदीस में दोनों के लिए एक ही लफ़्ज़ आया है। घर दोनों की मेहनत से बनता है, और दोनों की मेहनत अल्लाह के सामने है।
इस ज़िम्मेदारी का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा आपस का बर्ताव है। क़ुरआन कहता है: "और उनके साथ भले तरीक़े से रहो।"6 इसमें अच्छी बात करना, नरमी से पेश आना, और अपना रंग रूप भी ऐसा रखना शामिल है जो पत्नी को अच्छा लगे, जैसे मर्द अपने लिए यही चाहता है।7 एक दूसरे के लिए अच्छा दिखना भी मुहब्बत का एक प्यारा इज़हार है।
साथ साथ अल्लाह की तरफ़
जब घर में ऐसी नरमी आ जाती है, तो पति पत्नी दीन में भी एक दूसरे का हाथ थामने लगते हैं। नबी ﷺ ने ऐसे जोड़े के लिए दुआ फ़रमाई: "अल्लाह उस मर्द पर रहम करे जो रात को उठकर नमाज़ पढ़े और अपनी पत्नी को जगाए, और अगर वह न उठे तो उसके चेहरे पर पानी छिड़के। अल्लाह उस औरत पर रहम करे जो रात को उठकर नमाज़ पढ़े और अपने पति को जगाए, और अगर वह न उठे तो उसके चेहरे पर पानी छिड़के।"8 देखिए, दुआ दोनों के लिए एक जैसी है। जो पहले जाग जाए, वह दूसरे को भी साथ ले ले।
और इबादत का शौक़ घर से दूर नहीं ले जाता। एक सहाबी दिन भर रोज़े रखते और रात भर नमाज़ पढ़ते थे। नबी ﷺ ने उन्हें समझाया: "तुम्हारे जिस्म का तुम पर हक़ है, तुम्हारी आँखों का तुम पर हक़ है, और तुम्हारी पत्नी का तुम पर हक़ है।"9 यानी पत्नी के साथ वक़्त बिताना भी दीन का ही हिस्सा है।
जब पति और पत्नी एक दूसरे का ख़याल अल्लाह के लिए रखने लगते हैं, तो छोटे छोटे काम भी इबादत बन जाते हैं। अल्लाह तआला हर पति और पत्नी को एक दूसरे के लिए सुकून और ख़ुशी का ज़रिया बनाए। आमीन।
संदर्भ: 1 क़ुरआन 2:228, 2 सहीह मुस्लिम 1218a, 3 जामे तिरमिज़ी 1163, 4 सहीह अल-बुख़ारी 56, 5 सहीह अल-बुख़ारी 2554, 6 क़ुरआन 4:19, 7 तफ़्सीर इब्न कसीर 4:19, 8 सुनन अबू दाऊद 1308, 9 सहीह अल-बुख़ारी 5199.
अच्छे पति की ख़ूबियाँ
हर अच्छा पति चाहता है कि उसकी पत्नी उसके साथ ख़ुश रहे। इस रास्ते पर नबी ﷺ से बेहतर रहनुमा कोई नहीं, क्योंकि आप ने ख़ुद अपने घर में यह करके दिखाया। आप ने फ़रमाया: "तुम में सबसे अच्छा वह है जो अपने घर वालों के लिए सबसे अच्छा हो, और मैं तुम सब में अपने घर वालों के लिए सबसे अच्छा हूँ।"1 यानी एक मर्द की अच्छाई की पहचान उसके घर से होती है। आइए देखते हैं कि नबी ﷺ अपने घर में कैसे थे।
घर में साथ देना
किसी ने हज़रत आइशा से पूछा कि नबी ﷺ घर में क्या करते थे। उन्होंने बताया: "आप घर वालों के काम में लगे रहते थे, और जब नमाज़ का वक़्त आता तो नमाज़ के लिए चले जाते थे।"2 अल्लाह के रसूल, उम्मत के रहनुमा, और फिर भी घर के काम में हाथ बँटाते थे। जब कोई पति थकान के बाद भी पत्नी का काम हल्का कर देता है, तो वह नबी ﷺ की एक सुन्नत पर अमल कर रहा होता है, और पत्नी के दिल में उसकी जगह और बढ़ जाती है।
घर का साथ सिर्फ़ काम तक नहीं था। आप अपनी पत्नी के साथ हँसते खेलते भी थे। हज़रत आइशा एक सफ़र का वाक़िआ बताती हैं: "मैंने आप ﷺ से दौड़ लगाई और मैं आगे निकल गई। फिर जब मेरा वज़न बढ़ गया और मैंने दौड़ लगाई तो आप आगे निकल गए, और फ़रमाया: यह उस जीत का बदला है।"3 सोचा जाए तो यह कितनी छोटी सी बात है, लेकिन हज़रत आइशा ने इसे याद रखा और लोगों को बताया। पत्नी के साथ बिताया हुआ ऐसा हल्का फुल्का वक़्त भी रिश्ते को मज़बूत करता है।
दिल का हाल समझना
इसी साथ से एक दूसरे को समझना भी आता है। नबी ﷺ ने एक बार हज़रत आइशा से फ़रमाया: "मुझे पता चल जाता है कि कब तुम मुझसे ख़ुश हो और कब नाराज़।" उन्होंने पूछा कैसे? आप ने फ़रमाया कि जब तुम ख़ुश होती हो तो कहती हो "मुहम्मद के रब की क़सम", और जब नाराज़ होती हो तो कहती हो "इब्राहीम के रब की क़सम"। उन्होंने कहा: "जी हाँ, अल्लाह की क़सम, मैं सिर्फ़ आपका नाम छोड़ती हूँ।"4 आप ﷺ पत्नी के इतने छोटे से इशारे को भी पहचान लेते थे। अच्छा पति भी ऐसे ही पत्नी की बात के साथ उसका लहजा और उसकी ख़ामोशी भी समझने की कोशिश करता है।
यह ख़याल उन दिनों में और भी बढ़ जाता था जब पत्नी को अपनेपन की ज़्यादा ज़रूरत होती है। हज़रत आइशा बताती हैं: "मैं माहवारी की हालत में पीती, फिर बर्तन नबी ﷺ को देती, तो आप उसी जगह मुँह रखकर पीते जहाँ से मैंने पिया था।"5 इन दिनों में भी पत्नी के साथ वही नज़दीकी और वही इज़्ज़त, यह नबी ﷺ का तरीक़ा था।
घर में कभी कभी ऐसी बात भी हो जाती है जो अच्छी न लगे। देखिए, नबी ﷺ ने ऐसे मौक़े पर क्या किया। एक बार आप अपनी एक पत्नी के घर थे कि दूसरी पत्नी ने खाना भेजा। जिस पत्नी का घर था, उसने खाना लाने वाले के हाथ पर मारा और बर्तन गिरकर टूट गया। आप ने बर्तन के टुकड़े जमा किए, खाना समेटकर फ़रमाया: "तुम्हारी माँ को जलन हो गई।" फिर उसी घर से सही बर्तन मँगवाकर उस पत्नी को भिजवा दिया जिसका बर्तन टूटा था।6 इस रिवायत में न डाँट का ज़िक्र है, न ज़िल्लत का। नुक़सान का इंसाफ़ भी हो गया और घर का सुकून भी बचा रहा।
इसी नरमी का राज़ आप ﷺ ने एक छोटी सी बात में बता दिया: "कोई मोमिन मर्द किसी मोमिन औरत से नफ़रत न करे। अगर उसकी एक आदत उसे नापसंद है, तो दूसरी आदत पसंद आएगी।"7 जब नज़र ख़ूबियों पर रहती है तो वही पत्नी हर दिन एक नेमत लगती है। अल्लाह तआला हर पति को अपने घर वालों के लिए सबसे अच्छा बनने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।
संदर्भ: 1 जामे तिरमिज़ी 3895, 2 सहीह अल-बुख़ारी 676, 3 सुनन अबू दाऊद 2578, 4 सहीह अल-बुख़ारी 5228, 5 सहीह मुस्लिम 300, 6 सहीह अल-बुख़ारी 5225, 7 सहीह मुस्लिम 1468b.
पति की ज़िम्मेदारियाँ
निकाह के साथ एक मर्द की ज़िंदगी में एक नई ज़िम्मेदारी आती है। अब कोई है जो उसके भरोसे अपना घर छोड़कर आई है। इस ज़िम्मेदारी की शुरुआत एक तोहफ़े से होती है। क़ुरआन कहता है: "और औरतों को उनके महर ख़ुशी ख़ुशी दो।"1 यानी महर कोई बोझ या रस्म नहीं, बल्कि पत्नी का हक़ है, जो पति दिल की ख़ुशी से उसे देता है। यह नए घर की पहली अच्छी शुरुआत है।
इसी तोहफ़े से आगे रोज़ की ज़िम्मेदारी शुरू होती है, यानी घर का ख़र्च। इसमें अल्लाह ने मर्द पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डाला। क़ुरआन कहता है: "जिसके पास ज़्यादा है वह अपने हिसाब से ख़र्च करे, और जिसकी रोज़ी तंग हो वह उसी में से ख़र्च करे जो अल्लाह ने उसे दिया है। अल्लाह किसी पर उससे ज़्यादा बोझ नहीं डालता जितना उसने उसे दिया है। अल्लाह मुश्किल के बाद आसानी भी देगा।"2 इस आयत में पति के लिए बड़ा सुकून है। अल्लाह उससे वही चाहता है जो उसके बस में है, और तंगी के दिन हमेशा नहीं रहते।
घर का ख़र्च: एक इबादत
कभी कभी दिन भर की मेहनत के बाद लगता है कि यह सब तो बस घर चलाने के लिए है। लेकिन नबी ﷺ ने इसकी क़द्र बहुत ऊँची बताई है। आप ने फ़रमाया: "एक दीनार वह है जो तुमने अल्लाह की राह में ख़र्च किया, एक वह जो ग़ुलाम को आज़ाद करने में दिया, एक वह जो किसी ग़रीब को सदक़े में दिया, और एक वह जो अपने घर वालों पर ख़र्च किया। इन सब में सबसे ज़्यादा सवाब उस दीनार का है जो तुमने अपने घर वालों पर ख़र्च किया।"3
बस इसमें नीयत का ख़याल रहे। आप ﷺ ने फ़रमाया: "जब मुसलमान सवाब की नीयत से अपने घर वालों पर ख़र्च करता है, तो वह उसके लिए सदक़ा होता है।"4 तो जब पत्नी अपनी कोई ज़रूरत बताती है, और पति उसे पूरा करता है, तो वह अल्लाह के यहाँ अपने लिए सदक़ा जमा कर रहा होता है। यह सोच आ जाए तो पत्नी की ज़रूरत पूरी करना एक बोझ नहीं, बल्कि एक मौक़ा लगने लगता है।
एक सहाबी ने नबी ﷺ से पूछा कि पत्नी का पति पर क्या हक़ है। आप ने फ़रमाया: "जब तुम खाओ तो उसे भी खिलाओ, और जब तुम पहनो तो उसे भी पहनाओ।"5 इसमें कितनी प्यारी बात छुपी है। पति जो अपने लिए पसंद करता है, वही पत्नी के लिए भी पसंद करे। और इसी हदीस में आप ने यह भी फ़रमाया कि उसे बुरा भला न कहो।5 यानी पत्नी का हक़ सिर्फ़ खाने और कपड़े का नहीं, अच्छी बात का भी है। कभी कभी दो मीठे बोल किसी तोहफ़े से ज़्यादा क़ीमती होते हैं।
पत्नी के दिल का ख़याल
यह ख़याल छोटी छोटी बातों में भी दिखता है। जब सहाबा लंबे सफ़र से वापस आते, तो नबी ﷺ उन्हें समझाते कि रात को सीधे घर न जाएँ, बल्कि पत्नी को सँवरने का वक़्त दें।6,7 यानी पत्नी को भी यह मौक़ा मिले कि वह ख़ुशी से पति का इस्तिक़बाल कर सके। यह एक छोटी सी बात है, लेकिन इससे पता चलता है कि नबी ﷺ पत्नी के जज़्बात का कितना ख़याल रखते थे।
मियाँ बीवी का जिस्मानी रिश्ता भी इसी मुहब्बत का हिस्सा है, और इस्लाम ने इसे भी सवाब का काम बनाया है। नबी ﷺ ने फ़रमाया कि इस रिश्ते में भी सदक़ा है। सहाबा ने पूछा कि क्या अपनी ख़्वाहिश पूरी करने पर भी सवाब मिलेगा? आप ने फ़रमाया: "बताओ, अगर वह इसे हराम जगह पूरा करता तो क्या उसे गुनाह न होता? इसी तरह जब वह इसे हलाल जगह पूरा करता है, तो उसे सवाब मिलता है।"8 जब यह रिश्ता अल्लाह की पसंद का है, तो इसमें पत्नी की ख़ुशी का ख़याल रखना भी उसी अच्छाई का हिस्सा है।
घर को दीन से जोड़ना
इन सब के साथ एक और ख़ूबसूरत ज़िम्मेदारी है। क़ुरआन में नबी ﷺ से कहा गया: "और अपने घर वालों को नमाज़ का हुक्म दो और ख़ुद भी इस पर जमे रहो।"9 यहाँ पहले घर वालों का ज़िक्र है और फिर यह कि ख़ुद भी जमे रहो। घर में दीन सबसे अच्छे तरीक़े से तब आता है जब पति ख़ुद नमाज़ का पाबंदी से ख़याल रखे और मुहब्बत से घर वालों को भी साथ ले।
जब पति यह सब अल्लाह के लिए करता है, तो उसकी थकान भी सवाब बन जाती है और उसका घर भी सुकून की जगह। अल्लाह तआला हर पति को यह ज़िम्मेदारी ख़ुशी से निभाने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।
संदर्भ: 1 क़ुरआन 4:4, 2 क़ुरआन 65:7, 3 सहीह मुस्लिम 995, 4 सहीह अल-बुख़ारी 5351, 5 सुनन अबू दाऊद 2142, 6 सहीह अल-बुख़ारी 5244, 7 सहीह अल-बुख़ारी 5246, 8 सहीह मुस्लिम 1006, 9 क़ुरआन 20:132.
नेक पत्नी की ख़ूबियाँ
हर अच्छी पत्नी चाहती है कि उसका घर सुकून का घर हो और उसका पति उसके साथ ख़ुश रहे। इस चाहत की इस्लाम में बहुत क़द्र है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "यह दुनिया फ़ायदा उठाने की जगह है, और दुनिया की सबसे बेहतर नेमत नेक औरत है।"1 देखिए, दुनिया में कितनी चीज़ें हैं जिनके पीछे लोग भागते हैं, लेकिन नबी ﷺ ने सबसे बेहतर एक नेक औरत को कहा। यह उस औरत का मर्तबा है जो अपने घर को अपनी अच्छाई से रोशन रखती है।
जन्नत का आसान रास्ता
इस मर्तबे तक पहुँचने के लिए कोई बहुत मुश्किल काम नहीं चाहिए। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "जब औरत अपनी पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़े, रमज़ान के रोज़े रखे, अपनी इज़्ज़त की हिफ़ाज़त करे और अपने पति की बात माने, तो जन्नत के जिस दरवाज़े से चाहे अंदर चली जाए।"2 यह वही काम हैं जो एक मुसलमान औरत अपनी रोज़ की ज़िंदगी में करती है। अल्लाह ने इन्हीं पर इतना बड़ा इनाम रख दिया है। और पति की बात मानना भलाई के कामों में है, क्योंकि नबी ﷺ ने फ़रमाया है: "बात सिर्फ़ भलाई के कामों में मानी जाती है।"3
एक बार किसी ने नबी ﷺ से पूछा कि सबसे अच्छी औरत कौन सी है। आप ने फ़रमाया: "वह जो पति के देखने पर उसे ख़ुश कर दे, उसके कहने पर उसकी बात मान ले, और अपनी ज़ात और अपने माल के बारे में ऐसा कुछ न करे जो उसे नापसंद हो।"4 यहाँ पहली बात ख़ुशी की है। एक मुस्कुराहट, एक प्यारी बात और थोड़ा सा सँवरना, यह छोटी चीज़ें हैं, लेकिन दिन भर के थके हुए पति के लिए यही घर का सुकून बन जाती हैं। जब पत्नी इस नीयत से पति को ख़ुश करती है कि अल्लाह राज़ी हो, तो यह भी उसके लिए भलाई का काम बन जाता है।
दो रोशन मिसालें
नेक पत्नी की सबसे ख़ूबसूरत मिसाल हज़रत ख़दीजा हैं। जब नबी ﷺ पर पहली वही आई तो आप घबराए हुए घर आए और उन्हें सब कुछ बताया, और फ़रमाया कि मुझे अपनी जान का डर है। हज़रत ख़दीजा ने कहा: "हरगिज़ नहीं! अल्लाह की क़सम, अल्लाह आपको कभी रुसवा नहीं करेगा। आप रिश्तेदारों का ख़याल रखते हैं, ग़रीबों और बेसहारा लोगों की मदद करते हैं, मेहमानों की ख़ातिर करते हैं और मुश्किल में पड़ने वालों का साथ देते हैं।"5 उन्होंने उस मुश्किल घड़ी में पति को उनकी ख़ूबियाँ याद दिलाईं और फिर उन्हें साथ लेकर एक ऐसे आदमी के पास गईं जो आसमानी किताबों को जानता था। पति के मुश्किल वक़्त में उसके दिल को संभालना किसी भी पत्नी का बहुत बड़ा काम है।
इस साथ को नबी ﷺ ने कभी नहीं भुलाया। हज़रत आइशा बताती हैं कि आप उनके इंतिक़ाल के बाद भी अक्सर उन्हें याद करते, और जब बकरी ज़िबह करते तो उसका गोश्त हज़रत ख़दीजा की सहेलियों को भेजते।6 अल्लाह तआला ने भी उन्हें जन्नत में एक महल की ख़ुशख़बरी दी।7
दूसरी मिसाल हज़रत उम्मे सलमा की है। हुदैबिया के मौक़े पर नबी ﷺ ने सहाबा से क़ुरबानी करने और सर मुंडवाने को कहा। आप ने तीन बार फ़रमाया, लेकिन कोई नहीं उठा। आप हज़रत उम्मे सलमा के पास गए और उन्हें यह बात बताई। उन्होंने मशवरा दिया कि आप किसी से कुछ न कहें, बस बाहर जाकर अपनी क़ुरबानी कर लें और अपना सर मुंडवा लें। आप ने ऐसा ही किया, और जब सहाबा ने यह देखा तो सब उठकर क़ुरबानी करने लगे।8 यानी नेक पत्नी सिर्फ़ घर ही नहीं संभालती, वह अपने पति को अच्छा मशवरा भी देती है, और नबी ﷺ ने ख़ुद अपनी पत्नी के मशवरे को क़ुबूल फ़रमाया।
आख़िर में क़ुरआन का यह वादा याद रखिए: "जो भी नेक काम करे, मर्द हो या औरत, और वह मोमिन हो, तो हम उसे ज़रूर अच्छी ज़िंदगी देंगे, और उन्हें उनके बेहतरीन कामों का बदला देंगे।"9 घर में की गई हर मेहनत और हर प्यार भरी बात अल्लाह के सामने है। अल्लाह तआला हर पत्नी को अपने घर के लिए सुकून और अपने पति के लिए सच्ची साथी बनाए। आमीन।
संदर्भ: 1 सहीह मुस्लिम 1467, 2 मिश्कातुल मसाबीह 3254, 3 सहीह अल-बुख़ारी 7257, 4 सुनन नसाई 3231, 5 सहीह अल-बुख़ारी 3, 6 सहीह अल-बुख़ारी 3818, 7 सहीह मुस्लिम 2435a, 8 सहीह अल-बुख़ारी 2731, 9 क़ुरआन 16:97.
पत्नी की ज़िम्मेदारियाँ
निकाह के बाद एक औरत एक नए घर की रोशनी बनकर आती है। इस घर को संभालना उसके लिए बहुत इज़्ज़त की बात है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "औरत अपने पति के घर और उसके बच्चों की निगहबान है।"1 निगहबान उस शख़्स को कहते हैं जिस पर किसी क़ीमती चीज़ के मामले में भरोसा किया जाए। यानी घर और बच्चों की देखभाल कोई छोटा काम नहीं, बल्कि एक अमानत है जो अल्लाह ने पत्नी के हाथों में दी है।
बच्चों पर प्यार, घर पर ध्यान
इस अमानत के दो ख़ूबसूरत पहलू नबी ﷺ ने एक हदीस में बताए हैं। आप ने अपने ज़माने की औरतों की तारीफ़ करते हुए फ़रमाया: "क़ुरैश की नेक औरतें अपने छोटे बच्चों पर सबसे ज़्यादा मेहरबान होती हैं, और अपने पति के माल का सबसे अच्छा ख़याल रखती हैं।"2 पहली ख़ूबी है बच्चों के साथ प्यार और नरमी। बचपन में माँ का प्यार ही बच्चों की सबसे बड़ी तालीम होता है। दूसरी ख़ूबी है घर के माल का ख़याल, यानी जो कुछ घर में आए उसे समझदारी से ख़र्च किया जाए। पति बाहर मेहनत करता है और पत्नी घर को संभालती है, और दोनों की कोशिश से ही घर आगे बढ़ता है।
घर के माल का ख़याल रखने का मतलब यह नहीं कि दिल तंग हो जाए। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "जब औरत अपने पति के घर से ख़ुशी से कुछ दे, और घर का नुक़सान न करे, तो उसे भी उसके पति जैसा सवाब मिलता है। उसे उसकी अच्छी नीयत का सवाब मिलता है।"3 यह बात उन छोटी चीज़ों की है जिनके बारे में पत्नी जानती है कि पति को बुरा नहीं लगेगा, जैसे किसी ज़रूरतमंद को खाना दे देना।4 देखिए, पति कमाता है, पत्नी दिल से देती है, और अल्लाह दोनों को सवाब देता है।
भरोसे का रिश्ता
घर की निगहबानी में यह भी आता है कि पत्नी पति की पसंद का ख़याल रखे। नबी ﷺ ने फ़रमाया कि औरत "उसके घर में किसी को उसकी इजाज़त के बग़ैर न आने दे।"5 इसका मतलब यह नहीं कि हर मेहमान के लिए अलग से पूछा जाए। अगर पत्नी को मालूम है कि पति को किसी के आने से कोई ऐतराज़ नहीं, तो इसमें कोई हर्ज नहीं।6 बात सिर्फ़ इतनी है कि घर दोनों का है, और एक दूसरे की पसंद के साथ चलने से भरोसा बढ़ता है।
इसी तरह नबी ﷺ ने एक और बात फ़रमाई: "औरत अपने पति की मौजूदगी में रमज़ान के अलावा कोई रोज़ा उसकी इजाज़त के बग़ैर न रखे।"7,8 यह हुक्म रमज़ान या फ़र्ज़ रोज़े का नहीं, बल्कि नफ़्ली रोज़े का है, और उस वक़्त का है जब पति घर पर हो। अगर पति सफ़र पर हो तो पत्नी नफ़्ली रोज़ा रख सकती है।6 इसकी हिकमत यह है कि मियाँ बीवी एक दूसरे के साथ का ख़याल रखें। और यह बात सिर्फ़ पत्नी के लिए नहीं। एक सहाबी दिन भर रोज़े रखते थे, तो नबी ﷺ ने उन्हें भी समझाया कि तुम्हारी पत्नी का भी तुम पर हक़ है।9 यानी इबादत का शौक़ अपनी जगह, और एक दूसरे का हक़ अपनी जगह।
जब पत्नी यह सब अल्लाह के लिए करती है, तो उसके घर के छोटे छोटे काम भी अल्लाह के यहाँ बड़े बन जाते हैं। अल्लाह तआला हर पत्नी को अपने घर की यह अमानत ख़ुशी से संभालने की तौफ़ीक़ दे और उसकी मेहनत को क़ुबूल फ़रमाए। आमीन।
संदर्भ: 1 सहीह अल-बुख़ारी 5200, 2 सहीह अल-बुख़ारी 5365, 3 जामे तिरमिज़ी 672, 4 फ़त्हुल बारी 9/297, 5 सहीह अल-बुख़ारी 5195, 6 फ़त्हुल बारी 9/296, 7 सुनन अबू दाऊद 2458, 8 सहीह अल-बुख़ारी 5192, 9 सहीह अल-बुख़ारी 5199.
जिन बातों से रिश्ते को बचाना है
जिस चीज़ से हम मुहब्बत करते हैं, उसकी हिफ़ाज़त भी करते हैं। मियाँ बीवी का रिश्ता भी ऐसा ही है, और इसकी क़द्र शैतान भी जानता है। नबी ﷺ ने बताया कि इब्लीस अपना तख़्त पानी पर रखता है और अपने लश्कर लोगों को बहकाने भेजता है। उनमें से कोई आकर अपना काम बताता है तो वह कहता है कि तुमने कुछ नहीं किया। फिर एक आता है और कहता है कि मैंने पति और पत्नी के बीच जुदाई डाल दी। तब इब्लीस उसे अपने पास बुलाता है और कहता है कि तुमने बहुत अच्छा किया।1 इससे पता चलता है कि एक अच्छा रिश्ता कितनी बड़ी नेमत है। इसी लिए नबी ﷺ ने पति और पत्नी दोनों को कुछ बातों से पहले ही ख़बरदार कर दिया, ताकि उनका घर महफ़ूज़ रहे।
पति के लिए
मर्द की सबसे पहली ज़िम्मेदारी उसके घर वालों का ख़र्च है, इसलिए नबी ﷺ ने इस पर ख़ास ध्यान दिलाया: "आदमी के गुनहगार होने के लिए यही काफ़ी है कि वह उनका ख़याल न रखे जिनका ख़र्च उसके ज़िम्मे है।"2 यह उस मर्द की बात है जो दे सकता है और फिर भी ध्यान नहीं देता। जिसके हाथ तंग हों, उसके लिए अल्लाह ने पहले ही आसानी रखी है।
दूसरी बात ग़ुस्से की है। थकान और परेशानी में ग़ुस्सा आ सकता है, लेकिन उसे पत्नी पर निकालना अच्छे मर्द की पहचान नहीं। हज़रत आइशा बताती हैं कि नबी ﷺ ने कभी किसी औरत पर हाथ नहीं उठाया।3 और जब कुछ औरतों ने अपने पति की शिकायत की कि वे उन्हें मारते हैं, तो आप ने फ़रमाया: "ऐसे मर्द तुम में अच्छे लोग नहीं हैं।"4 यानी जो मर्द नबी ﷺ के तरीक़े पर चलना चाहता है, उसका हाथ और उसकी ज़बान दोनों पत्नी के लिए नरम होते हैं।
तीसरी बात वक़्त की है। काम, दोस्तों और इबादत के बीच कभी पत्नी पीछे रह जाती है, और उसे पता भी नहीं चलता कि वह कितनी अकेली हो गई। नबी ﷺ ने याद दिलाया: "तुम्हारी पत्नी का भी तुम पर हक़ है।"5 थोड़ा सा वक़्त, थोड़ी सी बातचीत, यह उस हक़ का भी हिस्सा है।
पत्नी के लिए
इसी तरह नबी ﷺ ने औरतों को भी कुछ बातों से ख़बरदार किया। एक बार सूरज ग्रहण की नमाज़ के बाद आप ने नाशुक्री से ख़बरदार करते हुए फ़रमाया: "अगर तुम उनमें से किसी के साथ ज़िंदगी भर अच्छा करो, और फिर वह तुम्हारी तरफ़ से कोई नापसंद बात देखे, तो कह देगी: मैंने तुमसे कभी कोई भलाई नहीं देखी।"6,7 यह ऐसी बात है जो नाराज़गी में ज़बान पर आ जाती है और पति के दिल को लगती है। जब नाराज़गी के वक़्त भी उसकी अच्छाइयाँ याद रहें, तो छोटी सी बात बड़ी नहीं बनती।
दूसरी बात मियाँ बीवी के रिश्ते की है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "जब मर्द अपनी पत्नी को अपने बिस्तर पर बुलाए और वह न आए, और पति रात भर उससे नाराज़ रहे, तो सुबह तक फ़रिश्ते उस पर लानत भेजते हैं।"8 यह सख़्त लफ़्ज़ इस रिश्ते की अहमियत बताते हैं। लेकिन यह हुक्म उस वक़्त का है जब कोई सही वजह न हो, जैसे बीमारी।9 अगर पति नाराज़ नहीं होता, तो इसका मतलब है कि उसने पत्नी की बात समझ ली या अपना हक़ छोड़ दिया, और फिर यह बात नहीं रहती।10 और अगर पति ने ख़ुद पत्नी पर ज़ुल्म करके दूरी पैदा की हो, तो इसका इल्ज़ाम पत्नी पर नहीं आता।10 पति और पत्नी एक दूसरे की ख़ुशी और हालत को समझकर चलें, तो ऐसी नौबत कम ही आती है।
तीसरी बात तलाक़ की है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "जो औरत किसी सख़्त वजह के बग़ैर अपने पति से तलाक़ माँगे, उस पर जन्नत की ख़ुशबू हराम है।"11,12 इसमें "सख़्त वजह के बग़ैर" के लफ़्ज़ बहुत अहम हैं। यानी जिस औरत को सच में नुक़सान या मुश्किल हो, उस पर यह बात लागू नहीं होती। यह नसीहत उस घड़ी के लिए है जब ग़ुस्से में ऐसी बात मुँह से निकल जाए जो दिल में नहीं होती।
दोनों के लिए
कुछ बातें दोनों के काम की हैं। घर की बात घर में रहे, और कोई बाहर वाला इस रिश्ते को ख़राब न करने पाए। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "जो किसी औरत को उसके पति के ख़िलाफ़ भड़काए, वह हम में से नहीं।"13 और एक दूसरे का शुक्रिया अदा करना भी न भूलिए, क्योंकि आप ﷺ ने फ़रमाया: "जो लोगों का शुक्रिया अदा नहीं करता, वह अल्लाह का शुक्रिया भी अदा नहीं करता।"14 रोज़ के छोटे कामों पर एक प्यारा सा शुक्रिया रिश्ते को ताज़ा रखता है।
ग़लती हर इंसान से होती है, और एक दूसरे को माफ़ करने से ही रिश्ता आगे बढ़ता है। अल्लाह तआला हर घर को शैतान के बहकावे से बचाए, और मियाँ बीवी के बीच मुहब्बत और रहमत को बढ़ाता रहे। आमीन।
संदर्भ: 1 सहीह मुस्लिम 2813b, 2 सुनन अबू दाऊद 1692, 3 सहीह मुस्लिम 2328a, 4 सुनन अबू दाऊद 2146, 5 सहीह अल-बुख़ारी 5199, 6 सहीह अल-बुख़ारी 29, 7 सहीह मुस्लिम 907, 8 सहीह अल-बुख़ारी 3237, 9 रियाज़ुस सालिहीन 1749, 10 फ़त्हुल बारी 9/294, 11 सुनन इब्न माजह 2055, 12 सुनन अबू दाऊद 2226, 13 सुनन अबू दाऊद 2175, 14 सुनन अबू दाऊद 4811.
घर का ज़िम्मेदार, बात मानना और उसकी हद
हर घर को चलाने के लिए कोई न कोई ज़िम्मेदार चाहिए होता है, जो फ़ैसले का बोझ भी उठाए और घर की फ़िक्र भी करे। क़ुरआन ने यह ज़िम्मेदारी मर्द पर डाली है: "मर्द औरतों के ज़िम्मेदार हैं, इस वजह से कि अल्लाह ने उनमें से कुछ को कुछ पर बढ़ाई दी है, और इस वजह से कि मर्द अपना माल ख़र्च करते हैं।"1 इस आयत में "क़व्वाम" का लफ़्ज़ आया है, जिसका मतलब है वह जो घर का सरबराह हो, उसकी देखभाल करे और उसका ख़र्च उठाए।2 यही वह दर्जा है जिसका ज़िक्र एक और आयत में है: "और औरतों के भी भले तरीक़े से वैसे ही हक़ हैं जैसे उन पर ज़िम्मेदारियाँ हैं, और मर्दों को उन पर एक दर्जा हासिल है।"3 देखिए, मर्द का दर्जा और औरत का हक़ एक ही आयत में साथ साथ आए हैं। इसलिए क़व्वाम होना पत्नी के हक़ को ख़त्म नहीं करता, बल्कि मर्द की ज़िम्मेदारी को बढ़ा देता है।
बात मानना और उसकी हद
इसी आयत में आगे नेक औरतों का ज़िक्र है: "तो नेक औरतें फ़रमाँबरदार होती हैं, और पति के पीछे अल्लाह की हिफ़ाज़त से वह हिफ़ाज़त करती हैं जिसकी हिफ़ाज़त का हुक्म है।"1 जब घर में एक ज़िम्मेदार हो, तो उसकी बात का मान रखना घर को सुकून देता है। लेकिन इस बात की एक साफ़ हद है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "गुनाह के काम में कोई बात नहीं मानी जाती। बात सिर्फ़ भलाई के कामों में मानी जाती है।"4 यानी अगर कोई पति ऐसी बात कहे जिससे अल्लाह नाराज़ होता हो, तो पत्नी पर उसे मानना ज़रूरी नहीं।
हर औरत का अपना रिश्ता अल्लाह से है, और उसके लिए उसका जवाब वह ख़ुद देगी। क़ुरआन ने ईमान वालों के लिए फ़िरऔन की बीवी की मिसाल दी है, जिन्होंने दुआ की: "ऐ मेरे रब, मेरे लिए अपने पास जन्नत में एक घर बना दे, और मुझे फ़िरऔन और उसके काम से बचा ले।"5 यह बहुत बड़ी मिसाल है, लेकिन इससे एक उसूल समझ आता है। पति का मान अपनी जगह, और अल्लाह का हुक्म सबसे ऊपर। इसी तरह औरत की इबादत का भी ख़याल रखा गया है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "अगर तुम में से किसी की पत्नी मस्जिद जाने की इजाज़त माँगे, तो वह उसे न रोके।"6 और औरतों से फ़रमाया: "जब तुम में से कोई मस्जिद आए, तो ख़ुशबू न लगाए।"7
जब बात बहुत बिगड़ जाए
अल्लाह करे यह दिन किसी घर में न आए, लेकिन क़ुरआन ने उस मुश्किल वक़्त का भी रास्ता बताया है जब पत्नी रिश्ते से सरकशी पर उतर आए: "और जिन औरतों से तुम्हें सरकशी का डर हो, उन्हें समझाओ, फिर उन्हें बिस्तर में अलग छोड़ दो, और उन्हें मारो। फिर अगर वे तुम्हारी बात मान लें, तो उन पर कोई रास्ता तलाश न करो। बेशक अल्लाह बहुत बुलंद और बहुत बड़ा है।"1 इस आयत को नबी ﷺ की बातों के साथ समझना ज़रूरी है। पहला क़दम समझाना है, दूसरा अलग सोना, और मारने का ज़िक्र सबसे आख़िर में आया है।
यह इजाज़त किस वजह से है, यह समझना सबसे ज़रूरी है। आयत में इसकी वजह सरकशी बताई गई है, यानी पत्नी का रिश्ते के ख़िलाफ़ खुलकर खड़ा हो जाना। नबी ﷺ ने अपने आख़िरी हज के ख़ुत्बे में इसकी वज़ाहत फ़रमाई। आप ने खुली हुई बुरी हरकत का ज़िक्र किया, और यह कि पत्नी पति के बिस्तर पर किसी ऐसे शख़्स को जगह दे जिसे वह नापसंद करता हो।8,9 क़ुरआन की इस आयत और इन हदीसों में सिर्फ़ यही वजह बताई गई है। इसलिए ग़ुस्सा निकालने के लिए, घर के काम की कमी पर, किसी बात पर इख़्तिलाफ़ होने पर या आदत के तौर पर मारना इस इजाज़त में शामिल नहीं।
इस वजह के होते हुए भी नबी ﷺ ने इसकी हद बता दी। आप ने फ़रमाया कि ऐसा मारो जो सख़्त न हो, जिससे न चोट लगे और न निशान पड़े10, और आप ने चेहरे पर मारने से भी मना किया।11 और जब पत्नी सरकशी छोड़ दे, तो आयत कहती है कि उसके ख़िलाफ़ कोई रास्ता तलाश न करो। आयत का आख़िरी हिस्सा मर्द को याद दिलाता है कि अगर उसने पत्नी पर ज़ुल्म किया, तो अल्लाह उससे बहुत बड़ा है।2
और इस मामले में हमारे लिए सबसे बड़ी मिसाल ख़ुद रसूलुल्लाह ﷺ हैं। हज़रत आइशा बताती हैं कि आप ने कभी किसी औरत पर हाथ नहीं उठाया।12 आप के घर में भी मुश्किल दिन आए, और आप की पत्नियों से भी ऐसी बातें हुईं जो अच्छी न लगें13, लेकिन आप ने कभी किसी पत्नी पर हाथ नहीं उठाया। आप ने फ़रमाया: "अल्लाह की बंदियों को न मारो।"14 और मारने वालों के बारे में फ़रमाया: "ऐसे मर्द तुम में अच्छे लोग नहीं हैं।"14 इजाज़त अपनी जगह है, लेकिन बेहतरीन मर्द का तरीक़ा रसूलुल्लाह ﷺ का तरीक़ा है। तो जिस मर्द को अपने नबी ﷺ जैसा बनना है, उसके लिए रास्ता यही है।
अगर किसी औरत को मार पीट या किसी नुक़सान का सामना हो, तो इस आयत को अपना बोझ न समझे। वह अपने घर के बड़े, किसी भरोसेमंद आलिम या मदद करने वाले लोगों से फ़ौरन बात करे। अल्लाह तआला हमारे घरों को नरमी और इंसाफ़ से भर दे, और हर पति को अपनी ज़िम्मेदारी नबी ﷺ के तरीक़े पर निभाने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।
संदर्भ: 1 क़ुरआन 4:34, 2 तफ़्सीर इब्न कसीर 4:34, 3 क़ुरआन 2:228, 4 सहीह अल-बुख़ारी 7257, 5 क़ुरआन 66:11, 6 सहीह अल-बुख़ारी 5238, 7 सहीह मुस्लिम 443b, 8 सहीह मुस्लिम 1218a, 9 जामे तिरमिज़ी 1163, 10 सुनन इब्न माजह 1851, 11 सुनन अबू दाऊद 2142, 12 सहीह मुस्लिम 2328a, 13 सहीह अल-बुख़ारी 5225, 14 सुनन अबू दाऊद 2146.
जब रिश्ता मुश्किल हो जाए
हर रिश्ते में कभी न कभी मुश्किल दिन आते हैं। दो अलग इंसान जब साथ रहते हैं तो कभी बात बिगड़ भी जाती है, और इसमें घबराने की कोई बात नहीं। क़ुरआन ने ऐसे वक़्त के लिए भी रहनुमाई दी है, और इसकी शुरुआत सब्र से होती है। मर्द से कहा गया: "अगर वे तुम्हें नापसंद हों, तो हो सकता है कि तुम एक चीज़ को नापसंद करो और अल्लाह उसमें बहुत सी भलाई रख दे।"1 जिस बात से आज दिल दुखा है, हो सकता है उसी रिश्ते में अल्लाह ने कल के लिए बहुत सी ख़ुशी रखी हो। इसलिए मुश्किल वक़्त में पहला क़दम जल्दी का नहीं, ठहरकर सोचने का है।
आपस में सुलह
ठहरकर सोचने के बाद बातचीत का रास्ता है। क़ुरआन औरत की तरफ़ से इस बात को यूँ बयान करता है: "और अगर किसी औरत को अपने पति से बदसुलूकी या बेरुख़ी का डर हो, तो दोनों पर कोई गुनाह नहीं कि आपस में सुलह कर लें, और सुलह बेहतर है।"2 यानी पत्नी भी अपनी परेशानी कह सकती है, और दोनों मिलकर कोई रास्ता निकाल सकते हैं। इसी आयत में आगे कहा गया: "और अगर तुम अच्छा बर्ताव करो और अल्लाह से डरो, तो अल्लाह तुम्हारे कामों से ख़ूब वाक़िफ़ है।"2 सुलह में कभी किसी को थोड़ा झुकना भी पड़ता है, और जो अल्लाह के लिए झुकता है, उसकी यह कोशिश अल्लाह के सामने है।
कभी ऐसा भी होता है कि दो लोग अकेले बात नहीं सुलझा पाते। इसके लिए क़ुरआन ने एक बहुत समझदारी का तरीक़ा बताया है: "और अगर तुम्हें दोनों के बीच झगड़े का डर हो, तो एक फ़ैसला करने वाला मर्द के घर वालों में से और एक औरत के घर वालों में से भेजो। अगर ये दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उन दोनों के बीच मिलाप पैदा कर देगा।"3 दोनों तरफ़ से एक एक समझदार इंसान हो, जो दोनों की बात सुने और जिसका मक़सद सुलह हो। और अल्लाह का वादा है कि जब नीयत सुलह की हो, तो वह मदद करता है।
अगर साथ रहना मुमकिन न रहे
पूरी कोशिश के बाद भी कभी साथ रहना मुमकिन नहीं रहता। इस्लाम ने ऐसे वक़्त के लिए भी इज़्ज़त का रास्ता रखा है। क़ुरआन कहता है: "तो या तो भले तरीक़े से रखो, या अच्छे तरीक़े से छोड़ दो।"4 और यह भी कहा: "और उन्हें नुक़सान पहुँचाने के लिए न रोको, ताकि उन पर ज़ुल्म करो। जो ऐसा करेगा, उसने अपने ऊपर ही ज़ुल्म किया।"5 औरत को भी यह हक़ दिया गया है कि सही वजह हो तो वह अलग होने की दरख़्वास्त करे। हज़रत साबित बिन क़ैस की पत्नी नबी ﷺ के पास आईं और कहा: "ऐ अल्लाह के रसूल, मैं साबित के अख़लाक़ या दीन में कोई ऐब नहीं निकालती, लेकिन मैं मुसलमान होते हुए यह पसंद नहीं करती कि उनके साथ रहकर इस्लाम के ख़िलाफ़ बर्ताव कर बैठूँ।" आप ने पूछा: "क्या तुम उनका बाग़ वापस कर दोगी?" उन्होंने कहा: "जी हाँ।" तो आप ने हज़रत साबित से फ़रमाया: "अपना बाग़ ले लो और इन्हें एक तलाक़ दे दो।"6 देखिए, उस ख़ातून ने न उनकी बुराई की, न कोई तमाशा हुआ। नबी ﷺ ने उसकी बात सुनी और मसला इज़्ज़त के साथ हल कर दिया।
ऐसे मामलों के अपने मसाइल हैं, इसलिए फ़ैसला ग़ुस्से में नहीं, बल्कि किसी भरोसेमंद आलिम से पूछकर किया जाए। और अगर किसी को मार पीट या किसी नुक़सान का सामना हो, तो वह देर न करे और अपने घर के बड़े लोगों या मदद करने वालों से फ़ौरन बात करे। और जिस वक़्त रिश्ते अलग भी हो रहे हों, उस वक़्त भी क़ुरआन यह कहता है: "और आपस की भलाई को न भूलो।"7
मुश्किल चाहे जितनी बड़ी लगे, अल्लाह का यह वादा याद रहे: "और जो अल्लाह से डरता है, अल्लाह उसके लिए रास्ता निकाल देता है।"8 अल्लाह तआला हर घर की मुश्किल आसान करे, और मियाँ बीवी को एक दूसरे के लिए सुकून और रहमत का ज़रिया बनाए। आमीन।
संदर्भ: 1 क़ुरआन 4:19, 2 क़ुरआन 4:128, 3 क़ुरआन 4:35, 4 क़ुरआन 2:229, 5 क़ुरआन 2:231, 6 सहीह अल-बुख़ारी 5273, 7 क़ुरआन 2:237, 8 क़ुरआन 65:2.