घर का ज़िम्मेदार, बात मानना और उसकी हद
हर घर को चलाने के लिए कोई न कोई ज़िम्मेदार चाहिए होता है, जो फ़ैसले का बोझ भी उठाए और घर की फ़िक्र भी करे। क़ुरआन ने यह ज़िम्मेदारी मर्द पर डाली है: "मर्द औरतों के ज़िम्मेदार हैं, इस वजह से कि अल्लाह ने उनमें से कुछ को कुछ पर बढ़ाई दी है, और इस वजह से कि मर्द अपना माल ख़र्च करते हैं।"1 इस आयत में "क़व्वाम" का लफ़्ज़ आया है, जिसका मतलब है वह जो घर का सरबराह हो, उसकी देखभाल करे और उसका ख़र्च उठाए।2 यही वह दर्जा है जिसका ज़िक्र एक और आयत में है: "और औरतों के भी भले तरीक़े से वैसे ही हक़ हैं जैसे उन पर ज़िम्मेदारियाँ हैं, और मर्दों को उन पर एक दर्जा हासिल है।"3 देखिए, मर्द का दर्जा और औरत का हक़ एक ही आयत में साथ साथ आए हैं। इसलिए क़व्वाम होना पत्नी के हक़ को ख़त्म नहीं करता, बल्कि मर्द की ज़िम्मेदारी को बढ़ा देता है।
बात मानना और उसकी हद
इसी आयत में आगे नेक औरतों का ज़िक्र है: "तो नेक औरतें फ़रमाँबरदार होती हैं, और पति के पीछे अल्लाह की हिफ़ाज़त से वह हिफ़ाज़त करती हैं जिसकी हिफ़ाज़त का हुक्म है।"1 जब घर में एक ज़िम्मेदार हो, तो उसकी बात का मान रखना घर को सुकून देता है। लेकिन इस बात की एक साफ़ हद है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "गुनाह के काम में कोई बात नहीं मानी जाती। बात सिर्फ़ भलाई के कामों में मानी जाती है।"4 यानी अगर कोई पति ऐसी बात कहे जिससे अल्लाह नाराज़ होता हो, तो पत्नी पर उसे मानना ज़रूरी नहीं।
हर औरत का अपना रिश्ता अल्लाह से है, और उसके लिए उसका जवाब वह ख़ुद देगी। क़ुरआन ने ईमान वालों के लिए फ़िरऔन की बीवी की मिसाल दी है, जिन्होंने दुआ की: "ऐ मेरे रब, मेरे लिए अपने पास जन्नत में एक घर बना दे, और मुझे फ़िरऔन और उसके काम से बचा ले।"5 यह बहुत बड़ी मिसाल है, लेकिन इससे एक उसूल समझ आता है। पति का मान अपनी जगह, और अल्लाह का हुक्म सबसे ऊपर। इसी तरह औरत की इबादत का भी ख़याल रखा गया है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "अगर तुम में से किसी की पत्नी मस्जिद जाने की इजाज़त माँगे, तो वह उसे न रोके।"6 और औरतों से फ़रमाया: "जब तुम में से कोई मस्जिद आए, तो ख़ुशबू न लगाए।"7
जब बात बहुत बिगड़ जाए
अल्लाह करे यह दिन किसी घर में न आए, लेकिन क़ुरआन ने उस मुश्किल वक़्त का भी रास्ता बताया है जब पत्नी रिश्ते से सरकशी पर उतर आए: "और जिन औरतों से तुम्हें सरकशी का डर हो, उन्हें समझाओ, फिर उन्हें बिस्तर में अलग छोड़ दो, और उन्हें मारो। फिर अगर वे तुम्हारी बात मान लें, तो उन पर कोई रास्ता तलाश न करो। बेशक अल्लाह बहुत बुलंद और बहुत बड़ा है।"1 इस आयत को नबी ﷺ की बातों के साथ समझना ज़रूरी है। पहला क़दम समझाना है, दूसरा अलग सोना, और मारने का ज़िक्र सबसे आख़िर में आया है।
यह इजाज़त किस वजह से है, यह समझना सबसे ज़रूरी है। आयत में इसकी वजह सरकशी बताई गई है, यानी पत्नी का रिश्ते के ख़िलाफ़ खुलकर खड़ा हो जाना। नबी ﷺ ने अपने आख़िरी हज के ख़ुत्बे में इसकी वज़ाहत फ़रमाई। आप ने खुली हुई बुरी हरकत का ज़िक्र किया, और यह कि पत्नी पति के बिस्तर पर किसी ऐसे शख़्स को जगह दे जिसे वह नापसंद करता हो।8,9 क़ुरआन की इस आयत और इन हदीसों में सिर्फ़ यही वजह बताई गई है। इसलिए ग़ुस्सा निकालने के लिए, घर के काम की कमी पर, किसी बात पर इख़्तिलाफ़ होने पर या आदत के तौर पर मारना इस इजाज़त में शामिल नहीं।
इस वजह के होते हुए भी नबी ﷺ ने इसकी हद बता दी। आप ने फ़रमाया कि ऐसा मारो जो सख़्त न हो, जिससे न चोट लगे और न निशान पड़े10, और आप ने चेहरे पर मारने से भी मना किया।11 और जब पत्नी सरकशी छोड़ दे, तो आयत कहती है कि उसके ख़िलाफ़ कोई रास्ता तलाश न करो। आयत का आख़िरी हिस्सा मर्द को याद दिलाता है कि अगर उसने पत्नी पर ज़ुल्म किया, तो अल्लाह उससे बहुत बड़ा है।2
और इस मामले में हमारे लिए सबसे बड़ी मिसाल ख़ुद रसूलुल्लाह ﷺ हैं। हज़रत आइशा बताती हैं कि आप ने कभी किसी औरत पर हाथ नहीं उठाया।12 आप के घर में भी मुश्किल दिन आए, और आप की पत्नियों से भी ऐसी बातें हुईं जो अच्छी न लगें13, लेकिन आप ने कभी किसी पत्नी पर हाथ नहीं उठाया। आप ने फ़रमाया: "अल्लाह की बंदियों को न मारो।"14 और मारने वालों के बारे में फ़रमाया: "ऐसे मर्द तुम में अच्छे लोग नहीं हैं।"14 इजाज़त अपनी जगह है, लेकिन बेहतरीन मर्द का तरीक़ा रसूलुल्लाह ﷺ का तरीक़ा है। तो जिस मर्द को अपने नबी ﷺ जैसा बनना है, उसके लिए रास्ता यही है।
अगर किसी औरत को मार पीट या किसी नुक़सान का सामना हो, तो इस आयत को अपना बोझ न समझे। वह अपने घर के बड़े, किसी भरोसेमंद आलिम या मदद करने वाले लोगों से फ़ौरन बात करे। अल्लाह तआला हमारे घरों को नरमी और इंसाफ़ से भर दे, और हर पति को अपनी ज़िम्मेदारी नबी ﷺ के तरीक़े पर निभाने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।
संदर्भ: 1 क़ुरआन 4:34, 2 तफ़्सीर इब्न कसीर 4:34, 3 क़ुरआन 2:228, 4 सहीह अल-बुख़ारी 7257, 5 क़ुरआन 66:11, 6 सहीह अल-बुख़ारी 5238, 7 सहीह मुस्लिम 443b, 8 सहीह मुस्लिम 1218a, 9 जामे तिरमिज़ी 1163, 10 सुनन इब्न माजह 1851, 11 सुनन अबू दाऊद 2142, 12 सहीह मुस्लिम 2328a, 13 सहीह अल-बुख़ारी 5225, 14 सुनन अबू दाऊद 2146.