पति की ज़िम्मेदारियाँ

निकाह के साथ एक मर्द की ज़िंदगी में एक नई ज़िम्मेदारी आती है। अब कोई है जो उसके भरोसे अपना घर छोड़कर आई है। इस ज़िम्मेदारी की शुरुआत एक तोहफ़े से होती है। क़ुरआन कहता है: "और औरतों को उनके महर ख़ुशी ख़ुशी दो।"1 यानी महर कोई बोझ या रस्म नहीं, बल्कि पत्नी का हक़ है, जो पति दिल की ख़ुशी से उसे देता है। यह नए घर की पहली अच्छी शुरुआत है।

इसी तोहफ़े से आगे रोज़ की ज़िम्मेदारी शुरू होती है, यानी घर का ख़र्च। इसमें अल्लाह ने मर्द पर उसकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डाला। क़ुरआन कहता है: "जिसके पास ज़्यादा है वह अपने हिसाब से ख़र्च करे, और जिसकी रोज़ी तंग हो वह उसी में से ख़र्च करे जो अल्लाह ने उसे दिया है। अल्लाह किसी पर उससे ज़्यादा बोझ नहीं डालता जितना उसने उसे दिया है। अल्लाह मुश्किल के बाद आसानी भी देगा।"2 इस आयत में पति के लिए बड़ा सुकून है। अल्लाह उससे वही चाहता है जो उसके बस में है, और तंगी के दिन हमेशा नहीं रहते।

घर का ख़र्च: एक इबादत

कभी कभी दिन भर की मेहनत के बाद लगता है कि यह सब तो बस घर चलाने के लिए है। लेकिन नबी ﷺ ने इसकी क़द्र बहुत ऊँची बताई है। आप ने फ़रमाया: "एक दीनार वह है जो तुमने अल्लाह की राह में ख़र्च किया, एक वह जो ग़ुलाम को आज़ाद करने में दिया, एक वह जो किसी ग़रीब को सदक़े में दिया, और एक वह जो अपने घर वालों पर ख़र्च किया। इन सब में सबसे ज़्यादा सवाब उस दीनार का है जो तुमने अपने घर वालों पर ख़र्च किया।"3

बस इसमें नीयत का ख़याल रहे। आप ﷺ ने फ़रमाया: "जब मुसलमान सवाब की नीयत से अपने घर वालों पर ख़र्च करता है, तो वह उसके लिए सदक़ा होता है।"4 तो जब पत्नी अपनी कोई ज़रूरत बताती है, और पति उसे पूरा करता है, तो वह अल्लाह के यहाँ अपने लिए सदक़ा जमा कर रहा होता है। यह सोच आ जाए तो पत्नी की ज़रूरत पूरी करना एक बोझ नहीं, बल्कि एक मौक़ा लगने लगता है।

एक सहाबी ने नबी ﷺ से पूछा कि पत्नी का पति पर क्या हक़ है। आप ने फ़रमाया: "जब तुम खाओ तो उसे भी खिलाओ, और जब तुम पहनो तो उसे भी पहनाओ।"5 इसमें कितनी प्यारी बात छुपी है। पति जो अपने लिए पसंद करता है, वही पत्नी के लिए भी पसंद करे। और इसी हदीस में आप ने यह भी फ़रमाया कि उसे बुरा भला न कहो।5 यानी पत्नी का हक़ सिर्फ़ खाने और कपड़े का नहीं, अच्छी बात का भी है। कभी कभी दो मीठे बोल किसी तोहफ़े से ज़्यादा क़ीमती होते हैं।

पत्नी के दिल का ख़याल

यह ख़याल छोटी छोटी बातों में भी दिखता है। जब सहाबा लंबे सफ़र से वापस आते, तो नबी ﷺ उन्हें समझाते कि रात को सीधे घर न जाएँ, बल्कि पत्नी को सँवरने का वक़्त दें।6,7 यानी पत्नी को भी यह मौक़ा मिले कि वह ख़ुशी से पति का इस्तिक़बाल कर सके। यह एक छोटी सी बात है, लेकिन इससे पता चलता है कि नबी ﷺ पत्नी के जज़्बात का कितना ख़याल रखते थे।

मियाँ बीवी का जिस्मानी रिश्ता भी इसी मुहब्बत का हिस्सा है, और इस्लाम ने इसे भी सवाब का काम बनाया है। नबी ﷺ ने फ़रमाया कि इस रिश्ते में भी सदक़ा है। सहाबा ने पूछा कि क्या अपनी ख़्वाहिश पूरी करने पर भी सवाब मिलेगा? आप ने फ़रमाया: "बताओ, अगर वह इसे हराम जगह पूरा करता तो क्या उसे गुनाह न होता? इसी तरह जब वह इसे हलाल जगह पूरा करता है, तो उसे सवाब मिलता है।"8 जब यह रिश्ता अल्लाह की पसंद का है, तो इसमें पत्नी की ख़ुशी का ख़याल रखना भी उसी अच्छाई का हिस्सा है।

घर को दीन से जोड़ना

इन सब के साथ एक और ख़ूबसूरत ज़िम्मेदारी है। क़ुरआन में नबी ﷺ से कहा गया: "और अपने घर वालों को नमाज़ का हुक्म दो और ख़ुद भी इस पर जमे रहो।"9 यहाँ पहले घर वालों का ज़िक्र है और फिर यह कि ख़ुद भी जमे रहो। घर में दीन सबसे अच्छे तरीक़े से तब आता है जब पति ख़ुद नमाज़ का पाबंदी से ख़याल रखे और मुहब्बत से घर वालों को भी साथ ले।

जब पति यह सब अल्लाह के लिए करता है, तो उसकी थकान भी सवाब बन जाती है और उसका घर भी सुकून की जगह। अल्लाह तआला हर पति को यह ज़िम्मेदारी ख़ुशी से निभाने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।


संदर्भ: 1 क़ुरआन 4:4, 2 क़ुरआन 65:7, 3 सहीह मुस्लिम 995, 4 सहीह अल-बुख़ारी 5351, 5 सुनन अबू दाऊद 2142, 6 सहीह अल-बुख़ारी 5244, 7 सहीह अल-बुख़ारी 5246, 8 सहीह मुस्लिम 1006, 9 क़ुरआन 20:132.


Revision #1
Created 2026-11-02 10:54:25 UTC by Danish Nayeem
Updated 2026-11-02 10:54:26 UTC by Danish Nayeem