# पत्नी की ज़िम्मेदारियाँ

निकाह के बाद एक औरत एक नए घर की रोशनी बनकर आती है। इस घर को संभालना उसके लिए बहुत इज़्ज़त की बात है। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "औरत अपने पति के घर और उसके बच्चों की निगहबान है।"<sup>[1](https://sunnah.com/bukhari:5200)</sup> निगहबान उस शख़्स को कहते हैं जिस पर किसी क़ीमती चीज़ के मामले में भरोसा किया जाए। यानी घर और बच्चों की देखभाल कोई छोटा काम नहीं, बल्कि एक अमानत है जो अल्लाह ने पत्नी के हाथों में दी है।

## बच्चों पर प्यार, घर पर ध्यान

इस अमानत के दो ख़ूबसूरत पहलू नबी ﷺ ने एक हदीस में बताए हैं। आप ने अपने ज़माने की औरतों की तारीफ़ करते हुए फ़रमाया: "क़ुरैश की नेक औरतें अपने छोटे बच्चों पर सबसे ज़्यादा मेहरबान होती हैं, और अपने पति के माल का सबसे अच्छा ख़याल रखती हैं।"<sup>[2](https://sunnah.com/bukhari:5365)</sup> पहली ख़ूबी है बच्चों के साथ प्यार और नरमी। बचपन में माँ का प्यार ही बच्चों की सबसे बड़ी तालीम होता है। दूसरी ख़ूबी है घर के माल का ख़याल, यानी जो कुछ घर में आए उसे समझदारी से ख़र्च किया जाए। पति बाहर मेहनत करता है और पत्नी घर को संभालती है, और दोनों की कोशिश से ही घर आगे बढ़ता है।

घर के माल का ख़याल रखने का मतलब यह नहीं कि दिल तंग हो जाए। नबी ﷺ ने फ़रमाया: "जब औरत अपने पति के घर से ख़ुशी से कुछ दे, और घर का नुक़सान न करे, तो उसे भी उसके पति जैसा सवाब मिलता है। उसे उसकी अच्छी नीयत का सवाब मिलता है।"<sup>[3](https://sunnah.com/tirmidhi:672)</sup> यह बात उन छोटी चीज़ों की है जिनके बारे में पत्नी जानती है कि पति को बुरा नहीं लगेगा, जैसे किसी ज़रूरतमंद को खाना दे देना।<sup>[4](https://shamela.ws/book/1673/5386)</sup> देखिए, पति कमाता है, पत्नी दिल से देती है, और अल्लाह दोनों को सवाब देता है।

## भरोसे का रिश्ता

घर की निगहबानी में यह भी आता है कि पत्नी पति की पसंद का ख़याल रखे। नबी ﷺ ने फ़रमाया कि औरत "उसके घर में किसी को उसकी इजाज़त के बग़ैर न आने दे।"<sup>[5](https://sunnah.com/bukhari:5195)</sup> इसका मतलब यह नहीं कि हर मेहमान के लिए अलग से पूछा जाए। अगर पत्नी को मालूम है कि पति को किसी के आने से कोई ऐतराज़ नहीं, तो इसमें कोई हर्ज नहीं।<sup>[6](https://shamela.ws/book/1673/5385)</sup> बात सिर्फ़ इतनी है कि घर दोनों का है, और एक दूसरे की पसंद के साथ चलने से भरोसा बढ़ता है।

इसी तरह नबी ﷺ ने एक और बात फ़रमाई: "औरत अपने पति की मौजूदगी में रमज़ान के अलावा कोई रोज़ा उसकी इजाज़त के बग़ैर न रखे।"<sup>[7](https://sunnah.com/abudawud:2458),[8](https://sunnah.com/bukhari:5192)</sup> यह हुक्म रमज़ान या फ़र्ज़ रोज़े का नहीं, बल्कि नफ़्ली रोज़े का है, और उस वक़्त का है जब पति घर पर हो। अगर पति सफ़र पर हो तो पत्नी नफ़्ली रोज़ा रख सकती है।<sup>[6](https://shamela.ws/book/1673/5385)</sup> इसकी हिकमत यह है कि मियाँ बीवी एक दूसरे के साथ का ख़याल रखें। और यह बात सिर्फ़ पत्नी के लिए नहीं। एक सहाबी दिन भर रोज़े रखते थे, तो नबी ﷺ ने उन्हें भी समझाया कि तुम्हारी पत्नी का भी तुम पर हक़ है।<sup>[9](https://sunnah.com/bukhari:5199)</sup> यानी इबादत का शौक़ अपनी जगह, और एक दूसरे का हक़ अपनी जगह।

जब पत्नी यह सब अल्लाह के लिए करती है, तो उसके घर के छोटे छोटे काम भी अल्लाह के यहाँ बड़े बन जाते हैं। अल्लाह तआला हर पत्नी को अपने घर की यह अमानत ख़ुशी से संभालने की तौफ़ीक़ दे और उसकी मेहनत को क़ुबूल फ़रमाए। आमीन।

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**संदर्भ:** <sup>1</sup> [सहीह अल-बुख़ारी 5200](https://sunnah.com/bukhari:5200), <sup>2</sup> [सहीह अल-बुख़ारी 5365](https://sunnah.com/bukhari:5365), <sup>3</sup> [जामे तिरमिज़ी 672](https://sunnah.com/tirmidhi:672), <sup>4</sup> [फ़त्हुल बारी 9/297](https://shamela.ws/book/1673/5386), <sup>5</sup> [सहीह अल-बुख़ारी 5195](https://sunnah.com/bukhari:5195), <sup>6</sup> [फ़त्हुल बारी 9/296](https://shamela.ws/book/1673/5385), <sup>7</sup> [सुनन अबू दाऊद 2458](https://sunnah.com/abudawud:2458), <sup>8</sup> [सहीह अल-बुख़ारी 5192](https://sunnah.com/bukhari:5192), <sup>9</sup> [सहीह अल-बुख़ारी 5199](https://sunnah.com/bukhari:5199).